अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान की मध्यस्थता में इस्लामाबाद में हुई हाई-लेवल शांति वार्ता एक अहम मोड़ पर आकर रुक गई। रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों देशों के बीच समझौता लगभग अंतिम चरण (करीब 80%) तक पहुंच गया था, लेकिन आखिरी समय में सहमति नहीं बन सकी।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि दोनों पक्ष “समझौते के बेहद करीब” थे, लेकिन अमेरिका के “अधिकतम मांगों” (maximalist demands) के कारण बातचीत टूट गई।
यह वार्ता करीब 21 घंटे तक चली, जिसमें परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंध हटाने, और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा हुई।
अमेरिका की ओर से उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि समझौता इसलिए नहीं हो सका क्योंकि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर झुकने को तैयार नहीं था।
वहीं ईरान का कहना है कि अमेरिका ने पहले से तय शर्तों को बदल दिया और दबाव बनाने की कोशिश की।
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई, लेकिन बातचीत के फेल होने से उसकी कोशिशों को बड़ा झटका लगा।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वार्ता विफल होते ही क्षेत्रीय तनाव बढ़ गया और पाकिस्तान का शेयर बाजार भी गिर गया।
हालांकि, दोनों देशों ने बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं किए हैं और भविष्य में फिर से वार्ता होने की संभावना बनी हुई है।
तथ्य जाँच (मुख्य बिंदु)
- वार्ता स्थान: इस्लामाबाद, पाकिस्तान में US-ईरान शांति वार्ता हुई।
- समय अवधि: बातचीत लगभग 21 घंटे तक चली।
- स्थिति: समझौता “करीब” था, लेकिन अंतिम सहमति नहीं बन सकी।
- ईरान का आरोप: अमेरिका ने अत्यधिक शर्तें रखीं (maximalist demands)।
- अमेरिका का आरोप: ईरान परमाणु कार्यक्रम छोड़ने को तैयार नहीं।
- मुख्य मुद्दे: परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंध हटाना, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज नियंत्रण।
- मध्यस्थ: पाकिस्तान ने वार्ता को आयोजित और संचालित किया।
- परिणाम: कोई अंतिम समझौता नहीं, वार्ता विफल।
- प्रभाव: क्षेत्रीय तनाव बढ़ा, आर्थिक असर (पाकिस्तान बाजार गिरा)।
- आगे की संभावना: भविष्य में फिर बातचीत की उम्मीद बनी हुई।
