प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद विवाद: प्रशासन का नोटिस, कानूनी टकराव और वर्तमान स्थिति
प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के दौरान ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। मेला प्रशासन ने उन्हें औपचारिक रूप से 24 घंटे का नोटिस जारी कर यह स्पष्ट करने को कहा है कि वे किस आधार पर “शंकराचार्य” पदवी का उपयोग कर रहे हैं, जबकि इस पद से जुड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट में पहले से लंबित है।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई
मौनी अमावस्या के अवसर पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने अनुयायियों के साथ संगम स्नान के लिए निकले थे। प्रशासन ने अत्यधिक भीड़ और सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए उनके रथ को आगे बढ़ने से रोक दिया। इसके बाद संत समाज में असंतोष फैला और मामला सार्वजनिक विवाद में बदल गया।
प्रशासन का कहना है कि किसी को स्नान से नहीं रोका गया, केवल रथ की पदयात्रा को नियंत्रित किया गया था। लेकिन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद समर्थकों ने इसे जानबूझकर किया गया अपमान बताया।
प्रशासन का तर्क
मेला प्राधिकरण का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य पद से जुड़ा मामला विचाराधीन है और 2022 में कोर्ट ने नई नियुक्ति पर रोक लगाई थी। ऐसे में सार्वजनिक मंचों पर खुद को “शंकराचार्य” के रूप में प्रस्तुत करना अदालत के आदेश का उल्लंघन हो सकता है। इसी आधार पर उनसे 24 घंटे में जवाब मांगा गया।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पक्ष
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने नोटिस को असंवैधानिक और धार्मिक मामलों में प्रशासन का हस्तक्षेप बताया है। उन्होंने मेला प्रशासन को कानूनी नोटिस भेजकर इसे वापस लेने की मांग की है। उनका कहना है कि शंकराचार्य की मान्यता का निर्णय सरकार नहीं, बल्कि परंपरागत पीठ और संत समाज करता है।
उनका यह भी दावा है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कहीं यह नहीं कहा गया है कि वे अपने नाम के आगे “शंकराचार्य” शब्द का उपयोग नहीं कर सकते।
वर्तमान स्थिति
- स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रशासन को विस्तृत लिखित जवाब भेज दिया है।
- संत समाज के एक वर्ग ने उनके समर्थन में बयान दिए हैं।
- प्रशासन अपने नोटिस पर कायम है और आगे की कार्रवाई जवाब के अध्ययन के बाद तय की जाएगी।
- मामला अब धार्मिक परंपरा बनाम प्रशासनिक अधिकार के रूप में देखा जा रहा है।
तथ्य जांच (Fact Check)
- मेला प्रशासन द्वारा नोटिस जारी किया जाना सत्य है।
- सुप्रीम कोर्ट में ज्योतिषपीठ शंकराचार्य पद को लेकर मामला लंबित है।
- यह भी सही है कि आदेश की व्याख्या को लेकर दोनों पक्षों के अलग-अलग तर्क हैं।
- कोर्ट के आदेश में पदवी के उपयोग पर सीधा प्रतिबंध है या नहीं, यह अभी कानूनी व्याख्या का विषय बना हुआ है।
