भारत-चीन संबंधों पर सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने कहा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने पंचशील समझौता इसलिए चाहा था ताकि भारत-चीन सीमा पर स्थिरता और शांतिपूर्ण संबंध बनाए रखे जा सकें।
नई दिल्ली, भारत
भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने 13 फरवरी 2026 को कहा कि भारत-चीन के बीच 1954 में किए गए पंचशील समझौते के पीछे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की एक स्पष्ट विदेशनीति सोच थी। उन्होंने बताया कि नेहरू उस समय सीमा विवाद को स्थिरता और शांत वातावरण में बदलने के उद्देश्य से समझौते की तरफ आगे बढ़े।
CDS जनरल चौहान ने देहरादून में एक कार्यक्रम में कहा कि 1950 के दशक में भारत ने स्वतंत्रता हासिल की थी और ब्रिटिश शासन के बाद यह तय करना था कि सीमा कहां से शुरू होती है। उस समय भारत का रुख शांतिपूर्ण रहा और उन्होंने चीन के साथ स्थिर और दोस्ताना रिश्ते बनाने की कोशिश की। इसी सोच के तहत भारत ने तिब्बत को चीन के हिस्से के रूप में मान्यता दी और दोनों देशों ने पंचशील समझौता किया, जिसमें पारस्परिक सम्मान, अनाक्रमण न करना और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व जैसे पांच सिद्धांत सामने रखे गए।
उन्होंने यह भी कहा कि उस समय भारत मानता था कि इस समझौते के बाद उत्तरी सीमा विवाद को औपचारिक रूप से सुलझा लिया गया है और दोनों देशों में भविष्य में किसी बड़े तनाव की संभावना कम होगी। हालांकि बाद में यह धारणा पूरी तरह सही साबित नहीं हुई, क्योंकि 1962 में भारत-चीन युद्ध हुआ जिसने सीमाओं और क्षेत्रीय विवाद को और स्पष्ट कर दिया।
CDS ने सीमाओं और सरहदों के बीच का अंतर भी स्पष्ट करते हुए कहा कि जिस सीमा को मानचित्रों पर रेखा के रूप में दिखाया जाता है, वह एक राजनीतिक और कानूनी ढांचा है, जबकि “सरहद” संस्कृति और जमीनी व्यवहार को भी दर्शाती है। इसके साथ ही उन्होंने उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्रों को दो अप्रैल सीमा के विवादों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के रूप में संदर्भित किया।
तथ्य जांच
✔ भारत और चीन के बीच 1954 का पंचशील समझौता वास्तव में हुआ था और इसमें तिब्बत को चीन के हिस्से के रूप में मान्यता देना शामिल था।
✔ उस समय पंचशील की वजह से भारत-चीन के बीच व्यापार और शांति-सहयोग का आधार बनाया गया था।
✔ अगला बड़ा तनाव 1962 के भारत-चीन युद्ध के रूप में आया, जब सीमा विवाद हिंसक रूप लिया।
